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    प्रतीक यादव की मौत ने फिर खोले समाजवादी पार्टी के पारिवारिक राजनीति वाले ज़ख्म

    Viral Punjab NewsBy Viral Punjab NewsMay 13, 2026Updated:May 13, 2026No Comments4 Mins Read
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    प्रतीक यादव की मौत ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवादी पार्टी के अंदरूनी पारिवारिक विवादों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक लखनऊ में 38 साल की उम्र में प्रतीक यादव का निधन हो गया। हालांकि वे सीधे तौर पर सक्रिय राजनीति में नहीं थे, लेकिन उनकी पहचान एक बिजनेसमैन, फिटनेस प्रेमी और लग्जरी लाइफस्टाइल वाले व्यक्ति के रूप में थी।

    प्रतीक यादव की पहचान सिर्फ एक कारोबारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे मुलायम सिंह यादव के दूसरे परिवार से जुड़े होने के कारण हमेशा राजनीतिक चर्चाओं में बने रहे। उनकी मां साधना गुप्ता थीं, जिनके साथ मुलायम सिंह का रिश्ता लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। इसी वजह से यादव परिवार के भीतर “पहला परिवार” और “दूसरा परिवार” की चर्चा कई वर्षों तक चलती रही।

    समाजवादी पार्टी की कहानी भी यहां सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी की नहीं रह जाती, बल्कि एक पारिवारिक सत्ता संघर्ष की कहानी बन जाती है। 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। उस समय मंडल राजनीति, पिछड़ी जातियों का उभार और बाबरी मस्जिद विवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नया रूप दिया था। मुलायम सिंह ने खुद को पिछड़े वर्गों के नेता और मुस्लिम समुदाय के रक्षक के रूप में पेश किया। “MY Formula” यानी Muslim और Yadav समीकरण ने कई सालों तक पार्टी को मजबूती दी।

    लेकिन समय के साथ पार्टी का नियंत्रण एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव और अन्य पारिवारिक सदस्य पार्टी के प्रमुख चेहरे बनते गए। विरोधियों ने यहीं से आरोप लगाना शुरू किया कि समाजवादी पार्टी एक वैचारिक पार्टी के बजाय पारिवारिक कंपनी बन गई है, जहां पद और टिकट पारिवारिक समीकरणों के आधार पर तय होते हैं।

    2016-17 में यह पारिवारिक संघर्ष खुलकर सामने आ गया। एक तरफ अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव थे, जबकि दूसरी तरफ मुलायम सिंह, शिवपाल यादव और अमर सिंह का गुट माना जाता था। यह टकराव सिर्फ टिकट बंटवारे या पदों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे पुरानी और नई राजनीति के बीच की लड़ाई के रूप में भी देखा गया। अखिलेश यादव खुद को विकास और आधुनिक राजनीति का चेहरा बताने की कोशिश कर रहे थे, जबकि पुराना गुट पारंपरिक जातीय और संगठन आधारित राजनीति को महत्व दे रहा था।

    इस पूरे विवाद में अमर सिंह की भूमिका भी काफी चर्चा में रही। अखिलेश समर्थकों का दावा था कि अमर सिंह परिवारिक विवाद को और बढ़ा रहे हैं और मुलायम सिंह पर प्रभाव डाल रहे हैं। उस समय यह भी कहा गया कि समाजवादी पार्टी का रणनीतिक नियंत्रण परिवार के बाहर के कुछ प्रभावशाली चेहरों के हाथों में जा रहा है।

    भारतीय राजनीति में यह बहुत कम देखने को मिलता है कि एक सक्रिय पिता से बेटा पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले ले। लेकिन समाजवादी पार्टी में यह दृश्य भी देखने को मिला। पहले अखिलेश यादव को हटाने की कोशिश हुई, फिर अखिलेश गुट ने विरोध किया और आखिरकार चुनाव आयोग ने अखिलेश गुट को ही असली समाजवादी पार्टी माना। इस राजनीतिक लड़ाई को एक पारिवारिक त्रासदी के रूप में भी देखा गया।

    समाजवादी पार्टी पर “गुंडा राज” के आरोप भी लंबे समय से लगते रहे हैं। विरोधियों का दावा रहा कि पार्टी के कुछ कार्यकालों में कानून-व्यवस्था कमजोर रही और बाहुबली तत्वों को राजनीतिक संरक्षण मिला। बीजेपी ने इस नैरेटिव को खासतौर पर शहरी और मध्यम वर्ग के वोटरों के बीच प्रभावी ढंग से उठाया।

    इस बीच अपर्णा यादव का बीजेपी में जाना भी समाजवादी पार्टी के लिए बड़ा प्रतीकात्मक झटका माना गया। क्योंकि अपर्णा यादव मुलायम परिवार का हिस्सा थीं और उनके बीजेपी में जाने को “यादव परिवार में दरार” के रूप में पेश किया गया। प्रतीक यादव, जो अपर्णा के पति थे, इसी कारण फिर राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बने।

    आज अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। वे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और युवाओं व शहरी वोटरों को जोड़ना चाहते हैं। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि क्या समाजवादी पार्टी एक वैचारिक पार्टी है या फिर एक पारिवारिक सत्ता संरचना।

    प्रतीक यादव की मौत ने एक बार फिर यह बहस जिंदा कर दी है कि यादव परिवार की अंदरूनी राजनीति ने समाजवादी पार्टी की दिशा पर कितना बड़ा असर डाला। वे खुद कभी बड़े राजनीतिक नेता नहीं रहे, लेकिन उनकी मौत ने मुलायम सिंह के दूसरे परिवार, अखिलेश से संबंधों और समाजवादी पार्टी के पारिवारिक समीकरणों को फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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