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    Punjab: सुखबीर बादल को फिर मिला अकाली दल का नेतृत्व, सज़ा के दौरान चली थी गो//ली।

    Viral Punjab NewsBy Viral Punjab NewsApril 12, 2025No Comments5 Mins Read
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    Punjab से एक बड़ी खबर सामने आई है अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब परिसर के तेजा सिंह समुद्री हॉल में आयोजित पार्टी की बैठक में सुखबीर सिंह बादल को सर्वसम्मति से एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल का अध्यक्ष चुना गया। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बलविंदर सिंह भूंदड़ ने बैठक के दौरान उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे सभी सदस्यों ने समर्थन दिया।

    इस चुनाव में किसी भी अन्य सदस्य ने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन नहीं किया, जिससे सुखबीर बादल का चयन बिना विरोध के संभव हो सका। बैठक के दौरान चुनाव अधिकारी गुलजार सिंह रणिके ने औपचारिक रूप से उनके नाम की घोषणा की और उन्हें अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया।

    प्रधान चुने जाने के बाद सुखबीर बादल मीडिया के सामने आए। इस दौरान उन्होंने कहा,

    विरोधी पार्टियों ने क्षेत्रीय पार्टियों को नुकसान पहुंचाने के लिए तख्तों के जत्थेदारों को अपने पक्ष में कर लिया था और बागी गुट के नेता सत्ता के लालच में हैं।

    बादल ने करीब 5 महीने पहले SAD प्रमुख के पद से इस्तीफा दिया था, क्योंकि उन्हें तनखैया घोषित किया गया था। इस दौरान गोल्डन टेंपल में सजा भुगतते हुए उन पर गोली भी चलाने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह बच गए थे।

    सबसे बड़ी चुनौती: धार्मिक विवाद और सियासी उथल-पुथल के बीच वापसी

    सुखबीर बादल ने 16 नवंबर 2024 को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। तब उन्हें अकाल तख्त द्वारा ‘तनखैया’ (धार्मिक दोषी) घोषित किया गया था। 2 दिसंबर 2025 को अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह ने सुखबीर समेत पूरी मौजूदा पार्टी नेतृत्व को “पार्टी चलाने के अयोग्य” बताया था।

    इसके बाद, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने ज्ञानी रघबीर सिंह को उनके पद से हटा दिया और उनकी जगह जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज को नियुक्त किया।

    SAD प्रवक्ता दलजीत सिंह चीमा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पार्टी नेतृत्व पहले ही अकाल तख्त के निर्देशानुसार धार्मिक दंड भुगत चुका है। जब कोई धार्मिक सजा भुगत लेता है, तो वह पवित्र हो जाता है और पुरानी बातों को समाप्त माना जाता है।

    अकाली दल के सीनियर नेताओं का मानना है कि अकाल तख्त का निर्देश अब भी प्रभावी है। अकाल तख्त ने स्पष्ट रूप से कहा था कि पार्टी को नया नेता चुनना चाहिए, क्योंकि मौजूदा नेतृत्व अयोग्य है।

    समर्थकों का सुखबीर पर भरोसा

    सुखबीर के समर्थकों का मानना है कि उन्होंने पार्टी को कई जीत दिलाई और जब मुश्किल दौर आया, तो कुछ नेताओं ने उनका साथ छोड़कर स्वार्थ दिखाया। एक अन्य वरिष्ठ नेता ने सुखबीर के साहस और प्रतिबद्धता को याद करते हुए कहा, “उन्होंने पंथ के सामने पेश होकर तनखा भुगती। गोल्डन टेंपल के बाहर धार्मिक सज़ा के दौरान उन पर जानलेवा हमला भी हुआ, लेकिन वे डटे रहे।”

    सुखबीर बादल पहली बार दिसंबर 2008 में पार्टी अध्यक्ष बने थे, जब उनके पिता प्रकाश सिंह बादल पंजाब के मुख्यमंत्री थे। उन्हें पार्टी में ‘कॉर्पोरेट शैली’ की राजनीति लाने वाला भविष्य का नेता कहा गया था, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों से लगातार हार के बाद पार्टी में असंतोष बढ़ता गया।

    2007 से 2017 तक पंजाब की सत्ता में रही अकाली दल 2022 के विधानसभा चुनाव में महज तीन विधायकों तक सिमट गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल एक सांसद जीत पाया।

    अकाली दल के सामने दो चुनौतियां

    शनिवार का चुनाव पंथक राजनीति के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन अब अकाली दल के सामने कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और भाजपा के अलावा दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं।

    खडूर साहिब से सांसद और खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह पहले ही नया अकाली दल वारिस पंजाब दे के नाम से बना चुके हैं।
    अकाली दल के बागी नेता, जिन्होंने पहले अकाल दल रिफॉर्म कमेटी बनाई थी, उनकी अगली रणनीति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। सूत्रों का मानना है कि वे या तो खुद को असल अकाली बताकर नेतृत्व का दावा कर सकते हैं या कोई नया राजनीतिक दल बना सकते हैं।

    अकाली दल का 105 साल का इतिहास

    शिरोमणि अकाली दल अपना 105 साल का इतिहास अपने में संजोए बैठा है। इसकी स्थापना 14 दिसंबर 1920 को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सहयोग से हुई थी, जिसका उद्देश्य सिख समुदाय की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आवाज बनना था।

    1925 में गुरुद्वारा एक्ट लागू होने के बाद अकाली दल ने आजादी की लड़ाई में सक्रिय भाग लिया। “मैं मरां ते पंथ जिवे” की विचारधारा से प्रेरित होकर शुरुआती दौर में राजनीति से दूर रहा। 1937 के प्रोविंशियल चुनावों में 10 सीटें जीतकर दल ने राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा।

    देश के विभाजन के समय अकाली दल ने पुरजोर विरोध किया। फिरोजपुर और जीरा को पाकिस्तान में मिलाए जाने की खबर पर मास्टर तारा सिंह ने दिल्ली पहुंचकर वायसराय से यह निर्णय रुकवाया। संघर्षशील जीवन के बाद उनके पास मात्र 36 रुपए थे।

    प्रमुख प्रधान और वर्तमान नेतृत्व

    1921 में सरमुख सिंह झबाल पहले प्रधान बने। इसके बाद बाबा खड़क सिंह, मास्टर तारा सिंह, संत फतेह सिंह, हरचंद सिंह लोंगोवाल, प्रकाश सिंह बादल समेत कुल 20 प्रधान हुए। सुखबीर सिंह बादल अंतिम चुने गए प्रधान हैं। सबसे लंबे समय तक बादल परिवार के पास अकाली दल की कमान रही है।

    प्रकाश सिंह बादल शिरोमणि अकाली दल के प्रधान वर्ष 1996 से लेकर 2008 तक रहे। उन्होंने लगभग 12 वर्षों तक पार्टी की कमान संभाली। इस दौरान उन्होंने संगठन को मजबूती दी, पार्टी का मुख्यालय अमृतसर से चंडीगढ़ स्थानांतरित किया, और भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर अकाली-भाजपा की साझा सरकारें बनाईं। 2008 में उन्होंने अपना पद सुखबीर बादल को सौंप दिया।

    पार्टी में टूट-फूट लेकिन अस्तित्व बरकरार

    समय-समय पर दल में मतभेद हुए। 1960 के दशक में मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह तक भी पार्टी से अलग हुए। आज भी अलग-अलग नामों से अकाली दल मौजूद हैं, लेकिन सबसे प्रभावी इकाई शिअद (बादल) है।

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